बुधवार, 22 मार्च 2017

नीति आयोग

नीति आयोग National Institution For Transforming India, पंडित  जवाहर लाल नेहरू के युग में शुरू की गई योजना आयोग का प्रतिस्थापन है।  नेहरू काल में शुरू किये गए योजना आयोग (15 मार्च, 1950) ने भारत के पंचवर्षीय विकास की योजना को कई सालो  तक लागू किया। भारत में लगभग 30 साल के बाद पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई भाजपा सरकार ने वर्षों पुरानी योजना आयोग का नाम बदलकर 01जनवरी, 2015 को  नीति आयोग रख दिया है।

नीति आयोग का उद्देश्य है
ऐसे सुदृढ़ राज्यो का निर्माण करना जो आपस में एकजुट होकर एक सुदृढ़ भारत का निर्माण करे।  

राज्यो और केंद्र की ज्ञान प्रणालियां विकसित करना।

नीति आयोग ने "नीति व्याख्यान: ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया" का शुभारंभ करने की घोषणा की है।

इस आयोग की  कार्य प्रणाली में भी एक  बड़े स्तर पर बदलाव किया गया है।  इस नयी संस्था को थिंक  टैंक के रूप में वर्णित किया गया है। इस आयोग का प्रारंभिक कार्य सामाजिक व आर्थिक मुद्दों पर सरकार को सलाह देने का है ताकि सरकार ऐसी योजना का निर्माण करे जो लोगो के हित में हो।

नीति आयोग किस प्रकार योजना आयोग से भिन्न है:-

नीति आयोग ने लोगो के विकास के लिए नीति बनाने के लिए सहकारी संघवाद को शामिल  किया है।
इसके आधार पर केंद्र के साथ राज्य की योजनओ को बनाने में अपनी राय रख सकेंगे। इसका उद्देश्य जमीनी हक़ीक़त के आधार पर योजना बनाना होगा।

संरचना 

पदेन अध्यक्ष: प्रधानमंत्री  
गवर्निंग कौंसिल: राज्यो के मुख्यमंत्री और संघ शासित क्षेत्रों के लेफ्टिनेंट गवर्नर। 
क्षेत्रीय परिषद्: जरुरत के आधार पर गठित, मुख्यमंत्री एवं क्षेत्र के लेफ्टिनेंट को शामिल किया गया। 
सदस्य: पूर्णकालिक आधार पर। 
अंशकालिक सदस्य: अधिकतम 2 रोटेशनल, प्रासंगिक संस्थानों से 
पदेन सदस्य: मंत्रियो की परिषद् से अधिकतम 4, प्रधानमंत्री द्वारा नामित 
सी.ई.ओ.: निश्चित अवधि के लिए प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त   
सचिवालय: यदि आवश्यक हो 

अंकिता पांडे 
B.A. IInd Year
परिष्कार कॉलेज, जयपुर 

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

ट्रिपल तलाक

भारत एक प्रगतिशील राष्ट्र है। भौगोलिक सीमा ही किसी राष्ट्र की  परिभाषा  तय नहीं करती।
इसका आकलन मानव विकास सूचकांक सहित कई अन्य पैमानों पर किया जाता है। जिसमें समाज द्वारा महिलाओं के साथ होने वाला आचरण भी शामिल है।
फिर वह ट्रिपल तलाक हो या अन्य समस्या-
1. आज भारतीय आबादी का बड़ा हिस्सा मुस्लिम समुदाय है, इतनी बड़ी आबादी को निजी कानून की मनमानी पर छोड़ना उचित नहीं है। यह समाज और देश हित मे नहीं है एवं यह समाज व भारतीय संविधान के खिलाफ है।
जिसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि नागरिकों को खासकर मुस्लिम महिलाओं को निजी रीति रिवाज सामाजिक प्रथाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है।
2. भारत में मुस्लिम महिलाओं की ट्रिपल तलाक से संबंधित समस्या एक गंभीर रूप लेती जा रही है।
भारतीय मुस्लिम महिलाओं का मानना है कि मुस्लिम पर्सनल बोर्ड ने ट्रिपल तलाक देने की प्रक्रिया को वैध माना है। लेकिन यह पवित्र ग्रंथ कुरान के खिलाफ है।
क्योंकि मुस्लिम बोर्ड के नियमों के अनुसार मुस्लिम व्यक्ति के द्वारा एक सांस मे तीन बार तलाक तलाक तलाक बोलने पर पति पत्नी का रिश्ता खत्म हो जाता है।
क्या यह उचित है??
जबकि इस्लाम धर्म में तलाक इतना आसान नहीं है, जितना भारतीय मुस्लिम लोगों ने बना रखा है।

यह तो मौलवी भी मानते हैं कि कुरान एक बार में तीन तलाक को गलत बताता है।
पहली- दूसरी बार तलाक कहने के बाद 1 महीने 10 दिन और तीसरी बार तलाक कहने के बाद 3 महीने 10 दिन की मुद्दत के बाद ही तलाक पूरा माना जाना चाहिए।

3. लेकिन कुछ भारतीय मुस्लिम व लॉ बोर्ड का मानना है कि अगर व्यक्ति को इतना समय दिया गया तो वह दैत्य हो जाएगा।
कुछ मौलवियों का यह भी मानना है कि इस्लाम धर्म में बहु विवाह और एक बार में तीन तलाक मुसलमानों का सांस्कृतिक और सामाजिक मामला है, इसलिए न्यायालय को इससे दूर रहना चाहिए।
मौलवी और बदलाव विरोधी संस्था यह भूल गए कि ट्रिपल तलाक का यह मुद्दा मुस्लिम महिलाओं का है,उन्हें ही इसे भोगना पड़ता है।
यह एकतरफा फैसला है, जो मुस्लिम महिलाओं को  अनुचित लगता है।
इसलिए महिलाएं तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठा रही है, जनहित याचिका दायर कर रही है और सड़कों पर उतर रही है। जबकि भारत में मुस्लिम महिलाओं की मांग तलाक को खत्म करने की नहीं बल्कि ट्रिपल तलाक देने की प्रक्रिया को बदलने की है।
मुस्लिम महिलाओं का मानना है कि समय के साथ बदलाव होना जरूरी है। फिर वह बदलाव धर्म में हो या सामाजिक प्रथा या रीति-रिवाजों में।

# अन्य देशो से तुलना....
दुनिया की 22 इस्लामिक देश ट्रिपल तलाक को कब का रद्द कर चुके हैं। लेकिन भारत ऐसा एकमात्र जनतांत्रिक देश है, जहां ट्रिपल तलाक आज भी जारी है और मुस्लिम महिलाएं सुप्रीम कोर्ट से बराबरी का हक मांग रही हैं।
जो मामला अभी गर्माया हुआ है, कुछ दिनों बाद उसमें उबाल भी आएगा, यह प्राकृतिक नियम है।

अभी हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा यह कहा गया कि आधुनिक धर्मनिरपेक्ष देश में कानून का उद्देश्य सामाजिक बदलाव लाना है। फिर वह बदलाव किसी भी धर्म से संबंधित क्यों ना हो क्योंकि ऐसा ना किया गया ताे यह भारत की सफल देश बनने में बाधा हैं और यह व्यवहार या आचरण भारत को पीछे की तरफ धकेलता है।

न्यायालय ने  ट्रिपल तलाक की आलोचना करते हुए कहा "इस तरह से तुरंत तलाक देना सबसे ज्यादा अपमान जनक है,जो भारत को एक राष्ट्र बनाने में बाधक है।" अदालत ने कहा पूरा कुरान पत्नी को तब तक तलाक देने के बहाने से व्यक्ति को मना करता है जब तक विश्वसनीय रुप से पति की आज्ञा का पालन करती है।
न्यायालय ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर ही  तीखी टिप्पणी की और कहा कोई भी पर्सनल लॉ बोर्ड संविधान से ऊपर नहीं है। कोर्ट ने ट्रिपल तलाक को लेकर दो मुस्लिम महिलाओं की याचिका पर सुनवाई  में यह टिप्पणी की "न्यायलय का मानना है कि मजहब जो भी है, एक विश्वास है, यह तथ्य की संविधान धर्म से ऊपर है इसीलिए धर्म के नाम पर महिलाओं से भेदभाव नहीं होना चाहिए।"

जो सवाल न्यायालय को परेशान करता है वह यह कि.....
- क्या मुस्लिम पत्नियों को हमेशा इस तरह की स्वेच्छाचारिता से पीड़ित रहना चाहिए??
- क्या उनका निजी कानून इन दुर्भाग्यपूर्ण पत्नियों के प्रति  इतना कठोर होना चाहिए??
- क्या इन यातनाओं को खत्म करने के लिए निजी कानून में उचित संशोधन नहीं होना चाहिए??
न्यायिक आत्मा इन समस्याओं से परेशान हैं।

**सुझाव**
इस्लाम धर्म में शादी एक अनुबंध है। मेरा मानना है कि मुस्लिम महिलाओं को उनके हक दिलाने के लिए मुस्लिम मैरिज एक्ट बनाया जाना चाहिए।
इसमें निकाह से लेकर तलाक तक के प्रावधान हाे और उसका उल्लंघन करने वालों को सजा भी मिले।
युवा मुस्लिम महिलाओं के सम्मान के लिए लगातार काम कर रहे हैं और इस्लाम के नाम पर गुमराह करने वाले लोगों को कहना चाहते हैं कि वे महिलाओं को उनके हक दिलाने के लिए आगे आएं एवं तलाक की वजह से टूटते परिवारों को बचाया जा सकता है।
हमारे मुल्ला-मौलवी ऐसे मामलों में दंपत्तियों को समझाने का प्रयास भी करें।

राहुल शर्मा
(MA final)

दागियों पर लगाम

केंद्र सरकार आपराधिक छवि वाले नेताओं पर लगाम कसने जा रही है। विधि आयोग ने चुनाव आयोग तथा अन्य सम्बन्धित पक्षो से विचार विमर्श के बाद कुछ सिफारिशें प्रस्तुत की हैं। इनमें पांच साल या इससे अधिक की सजा वाले मामलों में चार्ज शीट दायर होने वाले नेताओं को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं होगी।आयोग ने राजनीतिक दलों के नेताओं के खिलाफ चल रहे मामलों की सुनवाई के लिए फ़ास्ट ट्रैक अदालते गठित करने का सुझाव भी दिया है।
इसके तहत ये अदालते  एक साल के भीतर मामलों पर फैसला सुना देंगी एवं विधि आयोग ने इसमें प्रावधान  यह भी रखा है कि, भले ही नेता ऊपरी अदालतों से बरी हो जाये, परंतु उनके चुनाव लड़ने पर रोक बरकरार रहेगी। ऐसे नेता भविष्य में न तो कोई राजनीतिक दल बना पाएंगे , और ना ही किसी राजनीतिक दल के पदाधिकारी बन पाएंगे।
चुनाव सुधार को लेकर पिछले दो दशकों से कार्यवाही चल रही है, लेकिन कोई नतीजे सामने नहीं आये। विधि आयोग ने सिफारिशों के मसौदे को अंतिम रूप दे दिया है एवं सरकार भी इन सिफारिशों को लागू करने की अंतिम प्रक्रिया से गुजर रही है।
देर से ही सही लेकिन अब भी ऐसी सिफारिशे लागू हो जाती है तो दूषित होती राजनीति में सुधार की उम्मीद जागती जरूर नजर आएगी।
मेरी राय में यदि इन सिफारिशों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर लागू किया जाये ।
राजनीति के अपराधीकरण ने लोकतंत्र पर दाग लगाया है, उसे धोये बिना हम सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाने के हकदार नहीं हो सकते।

द्योजीराम फौजदार
M.A. Final, Political Science

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

महिलाओं के कानूनी एवं सामाजिक अधिकार: वर्तमान परिदृश्य

भारतीय संविधान में महिला एवं पुरूष दोनों को समानता का अधिकार दिया गया है। शारीरिक और मानसिक तौर पर अगर कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार से भेदभाव करता है तो यह असंवैधानिक माना गया है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था- "जब तक महिलाओं की स्थिति नही सुधरती है, तब तक विश्व कल्याण की बात सोचना बेमानी होगी, क्योकि किसी पक्षी के लिए एक डैने से उड़ना सम्भव नही होता।"
लेकिन भारत के पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं की स्थिति में बहुत ज्यादा बदलाव नही आये हैं। महिलाओं के साथ लैंगिक भेदभाव की वजह से आधी आबादी को उन अधिकारों से वंचित रहना पड़ता है, जिन्हें संविधान प्रदत्त प्रावधानों के अलावा समय समय पर बनाये गए कानूनों एवं उनमे किये गए संशोधनों के जरिये उपलब्ध कराये गए हैं।

भारतीय संविधान में महिलाओं के लिए अनुच्छेद:-
1. अनुच्छेद 14 से 18 में देश के प्रत्येक नागरिक को समानता का अधिकार।
2. अनुच्छेद 15 (3) के अनुसार कोई बात राज्य की स्त्रियों एवं बालकों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।
3. अनुच्छेद 15 के अनुसार ही धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।
4. अनुच्छेद 23 के अनुसार मानव का दुर्व्यापार, बेगार प्रथा इसी प्रकार का अन्य बलात श्रम प्रतिषिद्ध किया जाता है।
5. अनुच्छेद 24 के अनुसार 14 वर्ष से कम आयु के लड़के एवम लड़कियों को कारखाने या खान में या अन्य किसी परिसंकटमय नियोजन काम करवाना अपराध है।

भारतीय संविधान में महिलाओं के लिए बनाए गए प्रमुख कानून:-
1. दहेज निवारक कानून:- यह कानून 1961 में पारित हुआ। इस कानून के अंतर्गत किसी भी महिला को दहेज लाने के लिए प्रताड़ित नहीं किया जा सकता तथा दहेज लेना एवं देना जुर्म है।
2. घरेलू हिंसा रोकथाम कानून:- इस कानून के तहत कोई भी महिला जिस पर घरेलू हिंसा हुई है, वह पुलिस स्टेशन जाकर इसकी FIR दर्ज करा सकती है।
3. प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का कानून:- अनुच्छेद 21 एवं 22 दैहिक स्वाधीनता का अधिकार प्रदान करते हैं एवं हर व्यक्ति को अपने शरीर एवं प्राण की सुरक्षा का हक है।
4. स्वरोजगार का अधिकार:- संविधान के अनुच्छेद 16 में स्पष्ट शब्दों में लिखा गया है हर व्यस्क लड़की एवं महिला को कामकाज के बदले वेतन प्राप्त करने का अधिकार पुरुषों के बराबर है।
5. राजनीतिक अधिकार:- कोई भी महिला चुनाव प्रक्रिया में भाग ले सकती है तथा वोट देने के लिए पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त है।
6. संपत्ति का अधिकार:- कोई भी बेटी अपने पिता की संपत्ति पर अपना अधिकार मांग सकती है तथा पिता भी अपनी इच्छा अनुसार अपनी संपत्ति अपनी पुत्री के नाम पर कर सकता है।
7. कार्य स्थल पर सुरक्षा संबंधी कानून:- कार्यस्थल पर महिलाओं को सुरक्षित वातावरण प्रदान करने के लिए सरकार ने कार्यस्थल पर महिला यौन उत्पीड़न रोकथाम निषेध और निवारण कानून बनाया है। इसके अंतर्गत एसिड हमला, यौन-उत्पीड़न, महिला के कपडे उतरवाना, छिपकर पीछा करना, नग्न घुमाना ऐसे विशिष्ट अपराधों के करने पर सजा हो सकती है।

निष्कर्ष:-
प्रत्येक देश की आधी आबादी महिलाओं पर आधारित होती है, लेकिन यह एक विडंबना ही है कि समाज में महिलाओं की स्थिति अत्यंत विरोधाभासी रही है। एक तरफ तो उसे शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ उसके खिलाफ अपराध और हिंसा की जाती है। इसलिए महिलाओं को जागरुक होकर उनके लिए बनाए गए कानूनों को जानकर उन्हें प्रयोग करना चाहिए तथा अपराधियों को सजा दिलवानी चाहिए।

हर्षित चंदेल
B.A. Final
परिष्कार कॉलेज

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

क्यों है आर्थिक सर्वेक्षण की आवश्यकता

केंद्रीय बजट 2017-18, 1 फरवरी को पेश किया गया। बजट पेश करने से पहले हमेशा ही आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया जाता है। आर्थिक सर्वेक्षण, वित्त मंत्रालय द्वारा पेश की गई देश की आर्थिक स्थिति की जानकारी देता है। जहां बजट आगामी वर्ष का होता है। वही आर्थिक सर्वेक्षण बीते वर्ष का होता है। इस सर्वेक्षण के तहत देश की आर्थिक स्थिति का पूरा ब्यौरा पेश किया जाता है। इसमें बीते एक साल में देश के विकास, किस क्षेत्र में कितना निवेश, कितना विकास, योजनाओं का क्रियान्वन कैसा रहा जैसे कई अहम पहलूओ के बारे में जानकारी दी जाती है। वही सर्वे में अर्थव्यवस्था, पूर्वानुमान और नीतिगत स्तर पर की गई चुनौतियों पर विस्तृत जानकारी दी जाती है। साथ ही किस क्षेत्र की स्थिति कैसी है और सुधार के लिए क्या रूप रेखा या उपाय अपनाए जाए। आर्थिक सर्वेक्षण एक  तरह से भविष्य में बनाई जाने वाली नीतियों के एक दृष्टिकोण का काम करता है। यह एक तरह से देश की आर्थिक स्थिति का आईना होता है । ऐसे मे इसकी मदद से आगामी बजट में किन क्षेत्रों पर फोकस किया जाना है, इसकी एक झलक मिल जाती है। हालांकि यह सर्वेक्षण सिफारिशों के रुप में प्रस्तुत किया जाता है। जिसे मुख्य आर्थिक सलाहकार के साथ वित्त और आर्थिक मामलों की जानकारी रखने वाली टीम तैयार करती है। परंतु इस पर कोई कानूनी बाध्यता नहीं होती है। इस वर्ष के लिए आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम है।

संगीता मेहरिया
बी.ए. तृतीय वर्ष
परिष्कार कॉलेज

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

M-Governance

Introduction:- M-Governance is a sub-domain of E-governance. It ensures that electronics services are available to people via mobile technologies using clevises such as mobile phones. It refers to collection of services as the strategic use of government services and applications which are only possible using cellular/mobile telephones, laptop computers, personal digital assistants and wireless internet infrastructure.

Benefits of M-Governance:- 
1. Cost reduction & Saving.
2. Proficiency.
3. Transformation of public sector.
4. Better services to the citizens.
5. Easy interaction.

Case of developing countries:-
1. Turkey:- 23.3 million people out of 69.6 million people are mobile users.
Increase in mobile phones users.
Apps- MOBESE (Mobile electronics system integration)
TBS (Traffic Information System)

2. Czech Republic:- Mobile phones have penetrated in 95% of 10 million population, one of the highest in and probably in the world. Since the mobile technology is very high, M-Government application are more effective and quick.
Example:- One day critical information delivery for citizens.

3. Philippines:- The mobile phones penetration in Philippines is 23.8% which accounts to 20 million mobile phone users out of 84 million population.
Example:- TXT CSC - SMS services launched by civil service commission to increase the efficiency and speed of service delivery.
Reporting Criminal Offense.
Polling coverage through SMS.

M-Governance in India:-  Govt. of India aims to utilize the massive reach of mobile phones and harness the potential of mobile applications to enable easy and round the clock access to public services, especially in the rural areas and to create unique infrastructure as well as application development ecosystem for M-Governance in the country. 
The Govt. of India is implementing the "Digital India" programme with a vision to transform India into a digitally empowered society and a knowledge economy.

Following are the main measures laid down by MEIT-
* Websites of all government departments and agencies shall be made mobile-compliant, using the "One Web" approach.
* Uniform/single pre-designated numbers shall be used for mobile-based services to ensure convenience.
* All departments and agencies shall develop and deploy mobile application for providing all their public services.

Today the mobile phone is not used as a communication tool to instantly communicate or send and get text and voice messages. It has emerged as the strongest technology to bridge the digital divide between urban and rural. Within two decades of its launch in India, mobile phones has reached remote rural areas despite hurdles like lack of connectivity and electricity and low level of literacy. On the other side it has created lakhs of direct and indirect job opportunities for the youth.

Sourabh Parihar
B.A. IIIrd year
Parishkar College

सोमवार, 2 जनवरी 2017

राज्यों में राज्यपाल की स्थिति एवं भूमिका

भारत का संविधान संघात्मक है। इसमें संघ तथा राज्यों के शासन के संबंध में प्रावधान किया गया है। संविधान के भाग 6 में राज्य शासन के लिए प्रावधान है। यह प्रावधान जम्मू कश्मीर को छोड़कर सभी राज्यों के लिए लागू होता है। जम्मू कश्मीर की विशेष स्थिति के कारण उसके लिए अलग संविधान है। संघ की तरह राज्य की भी शासन पद्धति संसदीय है। भारत में संघीय शासन की भांति राज्यों में भी कार्यपालिका के तीन रूप दिखाई देते हैं।
★नाम मात्र की कार्यपालिका:- राज्यपाल के रूप में
★ वास्तविक किन्तु राजनीतिक कार्यपालिका:- मुख्यमंत्री तथा मंत्रीपरिषद
★वास्तविक किंतु प्रशासनिक कार्य पालिका:- कर्मचारी तंत्र

राज्यपाल
राज्य प्रशासन में सर्वोच्च पद राज्यपाल का होता है। भारत में राज्यपाल का चयन अमेरिका की भांति जनता द्वारा निर्वाचित पद्धति से नहीं होता है, बल्कि हमारे यहां राज्यपाल राष्ट्रपति द्वारा नामित व्यक्ति होता है। राजस्थान में उदयपुर के महाराणा भूपाल सिंह को सन् 1952-55 तक राज्य का महाराज प्रमुख बनाया गया था। 1 नवंबर, 1956 से सभी राज्यों के गवर्नर राज्यपाल कहलाने लगे। दिल्ली, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह तथा पुदुच्चेरी में उप राज्यपाल का पद है। लक्षद्वीप, चंडीगढ़, दमन एवं दीव, दादरा एवं नगर हवेली में यह प्रशासक कहलाता है।

राज्यपाल की नियुक्ति
भारत में राज्यपाल का चयन कनाडा की भांति संघीय सरकार करती है। अनुच्छेद 155 के अनुसार राष्ट्रपति प्रत्यक्ष रुप से राज्यपाल की नियुक्ति करता है। नियुक्ति से संबंधित दो प्रथाएं प्रचलित हैं:-
★किसी व्यक्ति को उस राज्य का राज्यपाल नहीं नियुक्त किया जाएगा, जिसका वह निवासी हो।
★राज्यपाल की नियुक्ति से पूर्व राज्य के मुख्यमंत्री से विचार विमर्श किया जाता है।

कार्य अवधि
राज्यपाल केंद्र का प्रतिनिधि होता है तथा राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत पद पर बना रहता है। वह कभी भी पद से हटाया जा सकता है। यद्यपि राज्यपाल की कार्य अवधि उसकेे पदग्रहण से 5 वर्ष तक होती है। इस 5 वर्ष की अवधि के समापन के बाद वह तब तक पद पर बना रहता है, जब तक उसके उत्तराधिकारी पदग्रहण नहीं करते।

शक्तियां एवं कार्य
राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है। वह मंत्री परिषद की सलाह से कार्य करता है, परंतु उसकी संवैधानिक स्थिति मंत्रिपरिषद की तुलना में बहुत सुरक्षित है। वह राष्ट्रपति के समान असहाय नहीं है।
विवेकाधीन शक्ति:- परंपरा के अनुसार राज्यपाल राष्ट्रपति को भेजी जाने वाली पाक्षिक रिपोर्ट के संबंध में निर्णय ले सकता है।  कुछ राज्यों के राज्यपालों को विशेष उत्तरदायित्व का निर्वाह करना होता है। विशेष उत्तरदायित्व का अर्थ है राज्यपाल मंत्री परिषद की सलाह तो ले परंतु इसे मानने हेतु बाध्य नहीं हो और नहीं उसे सलाह लेने की जरूरत पड़ती है।

राज्यपाल की वास्तविक स्थिति एवं भूमिका
भारत सरकार अधिनियम 1935 के अंतर्गत राज्यपाल का पद वास्तविक शक्तियों से परिपूर्ण एक प्रभावी पद था। किन्तु नये संविधान में यह अंशतः प्रतीकात्मक पद बना दिया गया। इस संबंध में सरोजिनी नायडू ने राज्यपाल को "सोने के पिंजरे में कैद एक चिड़िया" के समान जबकि विजयलक्ष्मी पंडित ने इसे "वेतन का आकर्षण" बताया। राजस्थान की राज्यपाल मारग्रेट अल्वा का मत था कि राज्यपाल राज्य सरकारों के लिए "सिरदर्द" है, तो दूसरी ओर केंद्र सरकार भी इन्हें महत्व नहीं देती है।
चूंकि राज्यपाल जनसाधारण द्वारा चुना हुआ व्यक्ति न होकर राष्ट्रपति द्वारा नामित व्यक्ति होता है, अतः वह अपना अधिकांश कार्य राज्य के मंत्रिमंडल के परामर्श के अनुरूप करता है। जहां तक स्वविवेकीय शक्तियों का प्रश्न है, उन का अवसर दैनंदिन नहीं होता है, बल्कि विशेष परिस्थिति, वह भी सीमित स्वतंत्रता के साथ होता है। अतः राज्यपाल की स्थिति संवैधानिक प्रमुख के रूप में सैद्धांतिक है। राज्यपाल की भूमिका 'केंद्र के अभिकर्ता' के रूप में है जो राजनीतिक मान्यताओं तथा स्वार्थों के आधार पर निर्णय करते हैं।

राज्यपाल के पद से संबंधित समस्त व्यवस्था पर पुनर्विचार की आवश्यकता
भारतीय संविधान के द्वारा स्थापित राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत यदि किसी पद की गरिमा को सर्वाधिक आघात हुआ है, तो वह राज्यपाल का पद ही है। सर्वप्रथम:-
◆ राज्यपाल पद पर सर्वमान्य योग्यता और प्रतिष्ठा के व्यक्तियों को नियुक्त किया जाना चाहिए। राजनीतिज्ञ को राज्यपाल पद पर नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए। केवल ऐसे ही व्यक्ति को राज्यपाल के पद पर नियुक्त किया जाना चाहिए, जिन्होंने राजनीति, प्रशासन, शिक्षा, समाज सेवा के क्षेत्रों में सम्मान प्राप्त किया हो और जो दलीय राजनीति से ऊपर उठकर परिस्थितियों का आकलन करने तथा स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं।
◆ राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच संदेह, अविश्वास, मतभेद और तनाव की स्थिति उत्पन्न न हो; इसके लिए राज्यपाल की नियुक्ति के बारे में राज्य के मुख्यमंत्री से विचार विमर्श की व्यवस्था को अनिवार्य कर देना चाहिये।
◆ केंद्रीय सरकार द्वारा राज्यपाल के पद के संबंध में मर्यादित आचरण की स्थिति अपनाते हुए केंद्रीय सरकार द्वारा राज्यपाल की पदच्युति एवं मनमाने तौर पर राज्यपाल के एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरण के मार्ग संबंधित राजनीतिक विवादों से दूर रखने की चेष्टा की जानी चाहिए।

राजू धत्तरवाल
बीए द्वितीय वर्ष
परिष्कार कॉलेज